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प्रेम की प्रेमदीवानी हूँ..

मै प्रेम नगर की rअहने वाली॥ प्रेम की प्रेम दीवानी हूँ,। वह तो मेरा प्रेम दीवाना॥ मै उसकी घरवाली हूँ॥ सात साल पर बात हुयी थी॥ तेरह साल में हुयी मुलाक़ात॥ सोलह साल की भइल उमारिया॥ सूझे लाग उल्का पात॥ मै यौवन से भरी पूरी हूँ॥ मै उनकी मस्तानी हूँ॥ वह तो मेरा प्रेम दीवाना॥ मै उसकी घरवाली हूँ॥ नैन मेरे नाजुक लगत है॥ होठ नहीं किये रसपान॥ केश घनेरी हर हर डोले॥ करके आयी हूँ स्नान॥ रोक न पाऊ गी अपने को॥ मै उसकी प्रेम की डाली हूँ॥ चमके देहिया रूप सलोना॥ गमके अंगना कोना कोना॥ हंस देती तो मोती गिरते॥ दर लगता है लगे न टोना॥ बर्दाश्त की सीमा तोड़ चुकी हूँ॥ मै सपनों की क्यारी हूँ॥ वह तो मेरा प्रेम दीवाना॥ मै उसकी घरवाली हूँ॥

मै और जा जी,,

मै और झा जी ,,, मै: झा जी॥ झा जी: हां जी॥ मै: किस खेत की मुर्गिया अंडा नहीं देती है॥ झा जी: जिस खेत में मुर्गिया नहीं होती है॥ मै: झा जी॥ झा जी: हां जी॥ मै: ममता दीदी के आते ही रेल गाडी लोगो को क्यों रोज़ ठेल रही है॥ झा जी: क्यों की ममता लालू जैसे नहीं है॥ मै : झा जी॥ झा जी: हां जी॥ मै: हमारे देख में दिनों दिन महगाई क्यों दौड़ी चली आ रही है॥ झा जी: क्यों की भारत में भ्रष्टा चार व्याप्त है॥

क्यों दूर जाती हो...

साकी शराब हाथ ले॥ होठो पे गिरातीहो॥ होता हूँ नशा में जब॥ क्यों दूर जाती हो॥ आँखों के इशारों से पास बुलाती हो॥ कुछ बात नहीं कहती क्यों शर्माती हो॥ फिर दिल को तोड़ देती करीब नहीं आती हो॥ होता हूँ नशा में जब॥ क्यों दूर जाती हो॥ बाते बनाती खूब हो रूप है शलोना॥ मेरा दिल बोलता है तुम कुछ कहो न॥ जगा के यूं उमंगें क्यों भूल जाती हो॥ होता हूँ नशा में जब॥ क्यों दूर जाती हो॥ जब टूटता है दिल तो धुधाता सहारा॥ कोई नहीं दिखाता सामीप न किनारा॥ गम के दिनों में क्यों नज़र आती हो॥ होता हूँ नशा में जब॥ क्यों दूर जाती हो॥ मुझसे तो तो पूछिये हम कैसे जी रहे है॥ साथी समझ शराब को हम पी रहे है॥ तोड़ के वे बंधन क्यों पछता रही हो॥ होता हूँ नशा में जब॥ क्यों दूर जाती हो॥

हमारे समय पर मजाकिया नजर है ‘पीपली लाइव’

पीपली लाइव एक काल्‍पनिक कहानी है दो भाइयों की, जो किसान हैं। फिल्‍म की शुरुआत में कर्ज न चुकाने की वजह से वे अपनी जमीन खोने वाले हैं। इसी दौरान उन्‍हें पता चलता है एक सरकारी योजना के बारे में, जो कहती है कि जो किसान कर्जे की वजह से आत्‍महत्‍या करता है, उसके परिवार को एक लाख रुपये दिये जाएंगे। यह सुन कर बड़ा भाई छोटे भाई को मनाता है कि वह आत्‍महत्‍या कर ले ताकि परिवार को एक लाख रुपये मिल जाएं। बड़ा भाई थोड़ा तेज है। छोटा भोला है, तो उस वक्‍त तो वह मान जाता है। उस समय इन दोनों को बिल्‍कुल अंदाजा नहीं है कि जो कदम वे उठाने जा रहे हैं, उससे उस गांव में क्‍या होने वाला है। यह फिल्‍म एक मजाकिया नजर है, हमारी सोसायटी पर, हमारे समाज पर, हमारे एस्‍टैबलिशमेंट पर, मीडिया या सिविल सोसायटी पर… यह मजाकिया नजर है हम सब पर… जिसमें एक चीज कहां से शुरू होती है और कहां तक पहुंचती है। हालांकि यह एक मजाकिया नजर है… यह फिल्‍म कुछ अहम चीज बता रही है… हमारे समाज के बारे में… हमारे देश के बारे में… आमिर खान मोहल्‍ला पर पिछले दिनों फिल्‍मों में आ रहे किरदारों और विषयों पर लंबी बहस चली। यह फिल्‍म सुकून देती है ...

इस्लाम में आतंकवाद वर्जित क्यों?

Source: धर्म डेस्क. उज्जैन आं तकवाद यानि ऐसा वाद जिसे दिल और दिमाग से नहीं बल्कि बम और बंदूकों के दम पर फेलाया जाता है। धर्म कोई भी क्यों न हो वह आतंकवाद यानि कि दहशतगर्दी को इजाजत नहीं देता। किसी धर्म विशेष से आतंकवाद जैसे घिनोने कार्य को जोडऩा उचित नहीं है। इस्लाम धर्म की प्रमुख संस्थाएं दारूल उलूम देवबंद, आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड और वक्फ दारूल उलूम...आदि सभी ने उत्तर प्रदेश के देवबंद शहर में आयोजित देश के सर्वोच्च इस्लामिक सम्मेलन में ' आतंकवाद ' की सभी कार्रवाइयों को गैर धार्मिक होने के साथ ही ग़ैर इस्लामी भी कहा गया है। ऐलाने इस्लाम: इस सम्मेलन में एक महत्वपूर्ण घोषणापत्र भी पारित किया गया। दारुल-उलूम के आतंकवाद विरोधी सम्मेलन में भी सभी तरह की हिंसा और आतंकवाद की आलोचना करते हुए सर्वसम्मति से एक घोषणापत्र पारित किया गया। इस सम्मेलन में अनेक मुस्लिम विद्वानों, धार्मिक नेताओं और मौलवियों ने हिस्सा लिया। घोषणापत्र में कहा गया है- 'इस्लाम ऐसा धर्म है, जिसमें सभी के प्रति दया-दृष्टि रखी जाती है। इस्लाम सभी तरह की हिंसा, आतंकवाद और अत्याचार की कड़ी आलोचना करता ह...

एक आवश्‍यक निर्देश और आग्रह

प्रिय मित्रों पिछले कुछ दिनों से संस्‍कृत की लेखन कला विकास हेतु जो कक्ष्‍याएँ अब तक सम्‍पादित हुई हैं, उनमें आप लोगों की रूचि और उत्‍साह देखकर अति आनन्‍द प्राप्‍त हुआ । किन्‍तु अभी कुछ अधिक सफलता नहीं दिख रही है । मेरे कहने का तात्‍पर्य है कि आप में से कुछ मान्‍यों का प्रयास तो उत्‍तम रहा है किन्‍तु अन्‍यों का प्राय: समय के अभाव के कारण अधिक अभ्‍यास नहीं हो पा रहा है । इस के समाधान के लिये हमने एक उत्‍तम नीति सोंची है । बस आप लोगों का सहयोग मिले तो कुछ ही दिनों में चिट्ठा जगत पर संस्‍कृत के लेखकों की कतार खडी हो जाएगी । प्रस्‍ताव यह है कि आप में से जो लोग भी थोडा- बहुत भी संस्‍कृत में लिखना जानते हैं वो मेरे इस ब्‍लाग पर लेखन प्रारम्‍भ करें । आपको अधिक नहीं बस सप्‍ताह या दो सप्‍ताह में कोई एक छोटी सी लघुकथा या लेख लिखना है मुझे ईमेल करना है, मैं उन लेखों में जो छोटी मोटी गलतियॉं होगी उन्‍हे सही करके पुन: आपको मेल कर दूँगा और आप उसे मेरे इस ब्‍लाग पर अपने नाम से प्रकाशित करेंगे । इससे दो लाभ हैं एक तो आपको नये शब्‍दों और नये वाक्‍यों के लिखने का तरीका पता चलेगा और दूसरी बात कि...

जब मोर मगन हो करके नाचा..

मै मयूर मगन हो देख रहा था॥ जो उपवन में नाच दिखाता था॥ रिम-झिम रिम-झिम बारिश होती॥ मेढक तान लगाता था॥ संग सहिलिया रास रचाती॥ मोर मगन मुस्काता था॥ उसी समय कोयल की बोली॥ मन मेरा हर्षाती थी॥ अपनी प्रिया के गम में डूबा॥ आँखे आंसू बरसाती थी। मन थोड़ा उदास हुआ था॥ अपनी कमी टटोला था॥ रिम-झिम रिम-झिम बारिश होती॥ मेढक तान लगाता था॥ तभी पवन रस डोली थी॥ कानो में मेरे बोली थी॥ राह निहार रही तेरी जोगन॥ कानो में आभा बोली थी। अन्द्कार अब दूर होगया॥ मन जगा उजाला था॥ रिम-झिम रिम-झिम बारिश होती॥ मेढक तान लगाता था॥