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~~~~~~~~~~~~~~~~~~राम बाण दावा है ये~~~~~~~~~~~~~~

और अब क्या ........ धुप में लेन लगा कर वोट दिया | लोगो से वोट देने के लिए कहाँ पर ........... सर कार वो चाहेंगे और विकास भी वो चाहेंगे ............. क्यो ! क्यो ! सरकार सब वर्ग की हो ये जनता की राय है कानून भी इससे से बसता रखता है । सब वोट सबके लिए हम क्या कर सकते है । या हम रे लिए क्या बिकल्प है | आज हमने जिन्हें जिताया वो हार गए और जो जीता वो विकास कराएगा वहां जहाँ पर उसका या उसकी पार्टी का वर्चस्व होगा उसके लोग होंगे बिजली पानी सब फ्री मिलेगी इस बात का निर्धारण कौन करेगा की किस छेत्र को कितनी सुभिदः मिलेगी । ये नेता ये नही कर्पयंगे क्योकि इनकी मानसिकता इतनी गिनौनी है की ये मरी माँ को भी बेचने में शर्म नही करंगे तो आप के छेत्र का विकास कैसे कर्नेगे मेरा राम वान् उपाय विकाश का आधार जहाँ जितने परसेंट मतदान या % के आधार पर विकास जिस भूत पर जितना अधिक वोट डाला उस के लिए उतना पैसा जो वोट डालने जाएगा वो विकाश करवाएगा इस बात को ...

Loksangharsha: यहि देस कै भैया का होई

आओ हम सब मिलिकै रोई । यहि देस कै भैया का होई॥ खादी खाकी मौसेरे भाई , काटे मनइन कै गटई । आपन - आपन धरम छोडि , उई करत है दुनो चोरकटई ॥ यहि देस कै भैया का होई ॥ आओ हम .... तुम देखो जाई कचेहरी मा , सब रोवा - रोवा नोच लेई। अर्दली , वकील और पेशकार , मिली खून चूस जस जोंक लेई ॥ यहि देस कै भइया का होई ॥ आओ हम .... राम अंधेरे जन - प्रिय नेता , काटि चुके दस साल जेल है। और लड़े इलेक्शन जेलै से , मुल अब तो उई मंत्री जेल है ॥ यहि देस कै भइया का होई ॥ आओ हम .... बासी रोटी टूका - टूका , घिसुआ कै लरिके बाँटी रहे । जनता के सेवक नेताजी , मुर्गा बिरयानी काटि रहे ॥ यहि देस कै भइया का होई ॥ आओ हम .... नेता जी के घर भरी पड़ी , काजू बादामन की बोरी । मुल मूंगफली का तरस रहे , मजदूरन कै छोरा - छोरी ॥ यहि देस कै भइया का होई ॥ आओ हम .... मोहम्मद जमील शास्त्री प्रवक्ता ( हिन्दी )

हाँ बंधुओं....अब हमें इन सबकी तवज्जो करनी है....

हाँ बंधुओं....अब हमें इन सबकी तवज्जो करनी है.... मैं भूत बोल रहा हूँ ..........!! पूं ...... पूं ...... पूं ........!! होशियार ..... खबरदार ....... हर राहगुजर ......!! कुछ लोग फिर से राजा बनने जा रहे हैं .....!! आपने उनकी तवज्जो करनी है ......!! अभी उनके भाग्य की रेखाओं की उलटी गिनती शुरू होने वाली है ....!! अभी से हर तरफ़ नोटों के बण्डल और पैकेजों के पैकेज धरे जा रहे हैं ......!! अभी से कितने ही लोग मैनेज किए जा रहे हैं .....!! अभी सारी पार्टियों के दरबार खुले हुए हैं ....!! सरकार बनते ही बंद हो जायेंगे फ़िर से इस लोकतंत्र के मन्दिर के कपाट........ आम लोगों के लिए पाँच साल के लिए बंद .....!! इसी लोकतंत्र की हमें तवज्जो करनी है .....!! अभी - अभी संपन्न हुए इस मन्दिर की ठेकेदारी के चुनाव में खर्च हुए हैं महज पचास हज़ार करोड़ रूपये ..... जो अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में हुए खर्च .... आठ हज़ार करोड़ से बस कुछ ही ज्यादा है ....!! कारण .....!! अमेरिका में तो बेतरह मंदी है ...

कौन सबसे ज़्यादा लोकसभा सीट हासिल करेगा ?

आप सभी हिन्दुस्तान के दर्द के पाठकों से अनुरोध है कि कृपया उ स पार्टी  अथवा गठबंधन का नाम बताईये जो आगामी लोकसभा चुनाव में सबसे ज़्यादा सीट हासिल करेगी?  आपकी क्या राय है, बताईये ??????

वाह ! आइडिया का उपभोक्ता का पैसा इस्तेमाल करने का क्या आइडिया है

सलीम अख्तर सिद्दीकी मैं आइडिया मोबाइल कम्पनी का लगभग 6 साल पुराना उपभोक्ता हुं। यह कम्पनी अपने पुराने उपभोक्ताओं की कतई परवाह नहीं करती। बिल लेट होने पर 100 रुपये का जुर्माना वसूूल करती है। आउटगोइंग बंद कर देती है। मैं थोड़ा लापरवाह किस्म का इंसान हूं। लगभग पिछले 6-7 महीनों से लेट बिल जमा कर रहा हूं और 100 रुपये का जुर्माना भी अदा कर रहा हूं। अबकी बार भी ऐसा ही हुआ। 5 मई बिल जमा करने की तारीख थी। मैंने बिल जमा किया 11 मई को। फोन चालू था। लेकिन तीन दिन बाद आज 14 मई को 12 बजे के करीब मेरी आउटगोइंग बन्द कर दी गयी। कस्टमर केयर पर फोन किया तो कहा गया कि कम्पनी के पास अभी आपका बिल पेड नहीं हुआ है, इसलिए फोन बंद किया गया हैं। मुझे सलाह दी गयी कि जहां आपने बिल जमा किया है, वहां जाकर रसीद दिखाकर फोन चालू करा लें। सवाल यह है कि जब मैंने बिल जमा करा दिया है तो यह मेरी जिम्मेदारी क्यों है कि मैं बीस किलोमीटर दूर जाकर रसीद दिखाउं कि भैया मैंने आपके पास बिल जमा करा दिया है, मेरा फोन चालू कर दें। सवाल यह भी है कि यदि मैं ऐसी जगह होता, जहां पीसीओ की सुविधा नहीं होती और मुझे इमरजैंसी फोन करने की जरुरत प...

नवगीत: आचार्य संजीव 'सलिल', संपादक दिव्य नर्मदा

कहीं धूप क्यों?, कहीं छाँव क्यों??... सबमें तेरा अंश समाया, फ़िर क्यों भरमाती है काया? जब पाते तब- खोते हैं क्यों? जब खोते तब पाते पाया। अपने चलते सतत दाँव क्यों?... नीचे-ऊपर, ऊपर-नीचे। झूलें सब तू डोरी खींचे, कोई डरता, कोई हँसता। कोई रोये अँखियाँ मींचे। चंचल-घायल हुए पाँव क्यों?... तन पिंजरे में मन बेगाना। श्वास-आस का ताना-बाना। बुनता-गुनता चुप सर धुनता। तू परखे, दे संकट नाना। सूना पनघट, मौन गाँव क्यों?... ******

Loksangharsha: साम्प्रदायिकता और स्वार्थ

इस संघर्ष के युग में हर किसी को गिरोहबंदी की सूझती है। जो गिरोह बना सकता है,वह जीवन के हर एक विभाग में सफल है,जो नही बना सकता ,उसकी कहीं पूँछ नही -कहीं मान नही। हम अपने स्वार्थ के लिए अपने जात और अपने प्रान्त की दुहाई देते है । अगर हम बंगाली है,और हमने दवाओ की दुकान खोली है ,तो हम हरेक बंगाली से आशा रखते है की वह हमारा ग्राहक हो जाए ,हम बंगालियों को देख कर उनसे अपनापन का नाता जोड़ते है और अपने स्वार्थ के लिए प्रांतीय भावना की शरण लेते है । अगर हम हिंदू है और हमने स्वदेशी कपड़ो की दुकान खोली है ,तो हम अपने हिंदुत्व का शोर मचाते है और हिन्दुवो की साम्प्रदायिकता को जगाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते है । अगर इसमें सफलता न मिली ,तो अपनी जाती विशेष की हांक लगते है । इस तरह प्रांतीयता और साम्प्रदायिकता की जड़ भी कितनी ही बुरइयो की भांति हमारी आर्थिक परिस्तिथि से पोषक रस खींच कर फलती फूलती रहती है। हम अपने ग्राहकों को विशेष सुविधा देकर अपना ग्राहक नही बनते , सम्भव है उसमें हमारी हानि हो , इसलिए जातीय भेद की पूँछ पकड़कर बैतरणी के पास पहुँच जाते है । -प्रेमचंद, 19 फरवरी 1934 (आतंकवाद का सच से साभार ...