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लो क सं घ र्ष !: समय की सबसे बड़ी गाली-1

मैं एक भारतीय हूँ और हर भारतीय की तरह मुझे कुछ मूल्य घुट्टी में मिले हैं। मसलन परम्परा, देश और देश की सेना पर गर्व करना। हालाँकि ये समझना मुश्किल है कि हमारी परम्परा क्या है और देश का मतलब टाटा, अम्बानी और मित्तल है या फिर जनता; जिसमें किसान भी हैं और दूर दराज के आदिवासी भी; इसमें क्या वाकई बेरोजगार भी शामिल होते हैं? पर छोड़िए ना मैं देश पर गर्व करता हूँ और मानता हूँ कि सीमाओं की रक्षा करने वाले हमारे जवान कठिन परिस्थितियों में मौत का सामना करते हैं। अब जबकि उन पर गर्व करना कर्तव्य ही नहीं धर्म भी है तो हर भारतीय की तरह मैं भी उन पर गर्व करना चाहता हूँ। पर क्यों मनोरमा की लाश आँखांे के सामने आ जाती है। क्यों वस्त्रहीन दौड़ती हुई महिलाओं की दर्द भरे गुस्से की चीख दिल को चीर देती है ‘‘आओ! गाड़ दो अपना तिरंगा हमारी छाती पर।‘’
मनोरमा, याद है ना आपको, जुलाई 2004 में उनकी लाश झाड़ियों में पड़ी मिली। सात दिनों पहले सेना के जवानों ने उन्हें आतंकियों का सहयोगी होने के संदेह में, बिना किसी लिखा-पढ़ी या वारन्ट के घर से अगवा कर लिया था। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार उनके शरीर पर भयंकर शारीरिक यातनाओं और सामूहिक बलात्कार के चिन्ह थे वैसे जम्मू कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में मनोरमाओं की संख्या गिनता ही कौन है। यहाँ सेना द्वारा किसी को अगवा करने के लिए शक का बहाना भी नहीं चाहिए। इसी साल सोपिया (जम्मू कश्मीर) में दो लड़कियाँ (आसिया जान और उनकी रिश्तेदार निलोफर जान) सेना कैम्प के पास से गायब हो गईं, एक लड़की की उम्र महज 17 साल थी। लोग जब सड़कों पर उतर आए और जाँच का घेरा तंग होने लगा तो उनकी लाशें अचानक एक नाले में प्रकट हो गईं, हैरानी की बात थी इस जगह की छानबीन पहले भी की जा चुकी थी। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार दोनों के साथ अमानवीय तरीके से बलात्कार किया गया था। जाँच की हर दिशा सेना कैम्प की ओर इशारा करती रही। सूत्र बताते हैं कि जिस दिन दोनों गायब हुई थीं सेना कैम्प में किसी पार्टी का आयोजन था। कहने की जरूरत नहीं दोनों वाक़िअ़ात मंे किसी को सजा नहीं हुई। यह तथ्य दिल दहला देता है कि ये घटनाएँ अपवाद नहीं। छेड़छाड़ और बलात्कार सेना की आदत में शामिल होता जा रहा है। अधिकतर मामले प्रकाश में ही नहीं आ पाते क्योंकि अधिकांश पीड़ित जिस वर्ग के होते हैं, उनके लिए सेना जैसे संगठित गिरोह के सामने खड़े होने का साहस जुटा पाना ही असम्भव है। उपर्युक्त वाक़िअ़ात भी तब प्रकाश में आ सके जब स्थानीय लोगों ने इसके खिलाफ जबरदस्त विरोध प्रकट किया। मणिपुर में ऐसे अनेक वाक़िअ़ात को झेलती आ रहीं महिलाओं का धैर्य मनोरमा प्रकरण में चुक गया। उन्होंने मणिपुर सेना मुख्यालय के सामने निर्वस्त्र हो कर प्रदर्शन किया और नारे लगाए ‘‘हम सब मनोरमा की माएँ हैं हमारा बलात्कार करो।’’ शायद यह पहला वाक़िआ था जब प्रचलित मीडिया ने मणिपुर की हालत का जायजा लेने की कोशिश की। खैर दोषियों को तो सजा नहीं मिली लेकिन प्रदर्शनकारी महिलाओं को अश्लील व्यवहार करने के जुर्म में तीन माह की सजा हुई। क्या हमने वाकई कभी उस दर्द तक पहुँचने की कोशिश की है जो उन्हें कहने पर मजबूर करता है ‘‘वी आर इन्डियन बाई कर्स‘‘।
3 जून 2008 को श्रीनगर में शेख नाम का एक दिहाड़ी मजदूर अचानक हमेशा-हमेशा के लिए गायब हो गया। इसके कुछ दिनों बाद ही सेना के एक जवान की बेटी के अपहरणकर्ता का पीछा करते-करते बड़गम पुलिस ने चीची नामक एक व्यक्ति को वहाँ की एस.डी. कालोनी से गिरफ्तार किया। चीची के पास जो दस्तावेज प्राप्त हुए, वे उसे बन्दीपुर में सेना का सूत्र बताते थे। थोड़ी ही छान-बीन के बाद बड़गम पुलिस सक़्ते में आ गई क्यांेकि सूत्र बता रहे थे कि चीची को कुछ दिनों पहले मार गिराए गए एक आतंकवादी के साथ भी देखा गया था। चीची ने टूटने के बाद जो कहानी बताई वह एक दुःस्वप्न है। मार गिराया गया आतंकवादी ‘शेख’, वास्तव में श्रीनगर का दिहाड़ी मजदूर था जिसे चीची 200 रू प्रतिदिन की दिहाड़ी पर बन्दीपुर लाया था। बाद की कहानी साफ थी एक एनकाउण्टर और लाश के पास बन्दूक वगैरह-वगैरह। यह सब इसलिए क्योंकि एक मेजर ने चीची को आतंकवादी मुहैया करवाने के बदले एक लाख रूपये देने का वादा किया था। इस पर रक्षा प्रवक्ता एन.सी.विज का बयान था ‘‘वी विल इन्वेस्टिगेट व्हाट लेड टू दीज ऐलीगेशन अगेन्स्ट आर्मी यूनिट’’। स्थान- मेण्डेवाल, साल-2006, एक ऐसा ही एनकाउण्टर हुआ बाद में झूठा पाया गया। पाँच सैनिक गिरफ्तार किए गए जिसमें कमाण्ंिडग आफिसर भी शामिल था। मारे गए शौकत अहमद, जदिवाल जिले की मस्जिद के मौलवी थे। यह मामला भी तब प्रकाश में आया जब एक अन्य झूठे एनकाउण्टर की जाँच चल रही थी जिसमें अब्दुल रहमान नामक एक बेगुनाह व्यक्ति को विदेशी आतंकवादी बता कर मार गिराया गया था।
सितम्बर 11, कुपवाड़ा जिले में तो खुद सेना में भर्ती होने गए चार लोगों को मेडल की लालच में आतंकवादी बता कर मार ड़ाला गया। 22 सितम्बर 2003 को कोराझार जिले के चार बोडो युवकांे की सेना द्वारा हत्या। ये फेहरिस्त इतनी लम्बी है कि शायद कभी खत्म ही न हो। अभी पिछले महीने-अक्टूबर की 28 तारीख को जम्मू-कश्मीर की निवासी मुगनली अपने बेटे की राह तकते-तकते मर गईं। वह जम्मू कश्मीर के उन 10000 लोगों के परिजनों में से एक थी जो 1990 के बाद से गायब होते रहे। यही वह समय है जब जम्मू कश्मीर में सेना ने अपनी कवायदें तेज कीं थीं।
आखिर सेना के जवान ऐसा कैसे कर पाते हैं। साफ है इन जगहों पर उन्हें विशेषाधिकार दिए गए हैं। मणिपुर की बात करें तो वहाँ सैन्य विशेषाधिकार अधिनियम 1958 लागू है, इसके अनुसार सैनिक मात्र शक होने पर न कि सिर्फ किसी को गिरफ्तार कर सकते हैं बल्कि गोली भी मार सकते हैं। मारे जाने वाले निर्दोष लोगों की संख्या भयावह है लेकिन उससे भी भयावह -हमारे देश में कुछ जगहें ऐसी भी हैं जहाँ के लोगों की जिन्दगी किसी सैनिक के संदेह की मोहताज है। यही नहीं पीड़ित व्यक्ति न्याय के लिए अदालत का दरवाजा भी तब तक नहीं खटखटा सकता जब तक सेना इसकी इजाजत न दे दे।
सन् 2000 में पैरामिलिट्री असम राइफल ने मालोम बस स्टैण्ड पर 10 निर्दाेष नागरिकों को मार गिराया। इरोम शर्मिला (जो बतौर मानवाधिकार कार्यकर्ता ऐसे मामलों को पिछले कई सालों से देखती आ रहीं थीं ) 2 नवम्बर 2000 को आमरण अनशन पर बैठीं। माँग स्पष्ट थी। सैन्यबलों की तैनाती को मणिपुर से हटाया जाए और सैन्य विशेषाधिकार अधिनियम 1958 निरस्त किया जाए। उनका यह संघर्ष आज एक मिसाल बन चुका है और वे मानवाधिकारों की सुरक्षा चाहने वालों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। अपने इतिहास की किताबों में हम बेशक ‘रोलट एक्ट’ का विरोध करने वाले स्वतन्त्रता सेनानियों पर गर्व करते आ रहे हों पर आमरण अनशन के 9 साल पूरे कर चुकीं इरोम शर्मिला आज भी हिरासत में हैं। उन पर आत्महत्या के प्रयास का दोष लगाया गया है। ऐसे मामले में किसी व्यक्ति को 2 साल से अधिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता इसलिए हर 2 साल बाद उन्हें रिहा कर फिर से हिरासत में ले लिया जाता है, जहाँ उन्हें नाक के सहारे भोजन दे कर ज़िन्दा रखा जाता है।
लेकिन भूल जाइए सब। बस याद रखिए देश और देश की सेना पर गर्व करना, सुकून देता है खास तौर पर तब, जब पल्ले कुछ भी न हो और हमारी सरकार हमसे वह भी छीन लेना चाहती हो। कितना अच्छा होता है खाली जेबों और विपन्न लोगों द्वारा, पड़ोसी देशों के आक्रमण का खतरा बुन लेना और उसका सामना करती हमारी फौजों पर गर्व करना। जबकी हमारी फौजों का संचालन करने वाली सरकारें और भरी जेबें, जनता के अधिकारों पर अपना शिकंजा रोज-ब-रोज तंग करती जा रही हों। आइए वास्तविक खतरों को भुला दें और दूसरे डर पाल लें। मसलन - पाकिस्तान, चीन ही नहीं श्रीलंका से लेकर नेपाल यहाँ तक कि बंगला जैसे देश हम पर आक्रमण करके हमें अपना गुलाम बना लेंगे। इस तरह हमें अपने अधिकारों को खोने की प्रक्रिया में कम कष्ट का सामना करना पड़ेगा।

-पवन मेराज
मो0 09179371433

लोकसंघर्ष पत्रिका के दिसम्बर अंक में प्रकाशित

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