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कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों... ---संजीव 'सलिल'

कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों... ---संजीव 'सलिल' कथा-गीत: मैं बूढा बरगद हूँ यारों... संजीव 'सलिल' * * मैं बूढा बरगद हूँ यारों... है याद कभी मैं अंकुर था. दो पल्लव लिए लजाता था. ऊँचे वृक्षों को देख-देख- मैं खुद पर ही शर्माता था. धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ. शाखें फैलीं, पंछी आये. कुछ जल्दी छोड़ गए मुझको- कुछ बना घोंसला रह पाये. मेरे कोटर में साँप एक आ बसा हुआ मैं बहुत दुखी. चिड़ियों के अंडे खाता था- ले गया सपेरा, किया सुखी. वानर आ करते कूद-फांद. झकझोर डालियाँ मस्ताते. बच्चे आकर झूला झूलें- सावन में कजरी थे गाते. रातों को लगती पंचायत. उसमें आते थे बड़े-बड़े. लेकिन वे मन के छोटे थे- झगड़े ही करते सदा खड़े. कोमल कंठी ललनाएँ आ बन्ना-बन्नी गाया करतीं. मागरमाटी पर कर प्रणाम- माटी लेकर जाया करतीं. मैं सबको देता आशीषें. सबको दुलराया करता था. सबके सुख-दुःख का साथी था- सबके सँग जीता-मरता था. है काल बली, सब बदल गया. कुछ गाँव छोड़कर शहर गए. कुछ राजनीति में डूब गए- घोलते फिजां में ज़हर गए. जंगल काटे, पर्वत खोदे. सब ताल-तलैयाँ पूर ...

लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009- अंतिम भाग

इसी प्रकार वर्ष -2009 में मेरी दृष्टि कई अजीबो - गरीब पोस्ट पर गई । मसलन - एक हिंदुस्तानी की डायरी में 10 फरवरी को प्रकाशित पोस्ट - हिंदी में साहित्यकार बनते नहीं , बनाए जाते हैं। प्रत्यक्षा पर 26 मार्च को प्रकाशित पोस्ट - तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है ? विनय पत्रिका में 27 मार्च को प्रकाशित बहुत कठिन है अकेले रहना। निर्मल आनंद पर 05 फरवरी को प्रकाशित आदमी के पास आँत नहीं है क्या ? छुट-पुट पर 02 जुलाई को प्रकाशित पोस्ट - इंटरनेट ( अन्तरजाल ) का प्रयोग मौलिक अधिकार है। सामयिकी पर 09 जनवरी को प्रकाशित आलेख , जमाना स्ट्राइसैंड प्रभाव का आदि। ये सभी पोस्ट शीर्षक की दृष्टि से ही केवल अचंभित नहीं करते बल्कि विचारों की गहराई में डूबने को विवश भी करते हैं। कई आलेख तो ऐसे हैं जो गंभीर विमर्श को जन्म देने की गुंजाइश रखते हैं। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है, कि वर्ष -2007 में हिन्दी ब्लॉग की संख्या लगभग पौने चार हजार के आस-पास थी जबकि महज दो वर्षों के भीतर चिट्ठाजगत के आँकड़ों के अनुसार सक्रिय हिन्दी चिट्ठ...
सारांश यहाँ आगे पढ़ें के आगे यहाँ

लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009, भाग-7

.. आज जिसप्रकार हिन्दी के चिट्ठाकार अपने लघु प्रयास से व्यापक प्रभामंडल बनाने में सफल हो रहे हैं , वह भी साधन और सूचना की न्यूनता के बावजूद , कम संतोष की बात नही है । हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप देने में हर उस ब्लोगर की महत्वपूर्ण भुमिका है जो बेहतर प्रस्तुतीकरण , गंभीर चिंतन , सम सामयिक विषयों पर सूक्ष्मदृष्टि , सृजनात्मकता , समाज की कु संगतियों पर प्रहार और साहित्यिक - सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से अपनी बात रखने में सफल हो रहे हैं। ब्लॉग लेखन और वाचन के लिए सबसे सुखद पहलू तो यह है कि हिन्दी में बेहतर ब्लॉग लेखन की शुरुआत हो चुकी है जो हम सभी के लिए शुभ संकेत का द्योतक है । हम चर्चा करेंगे वर्ष -२००९ के उन महत्वपूर्ण चिट्ठों की जिनके पोस्ट पढ़ते हुए हमें महसूस हुआ कि यह विचित्र किंतु सत्य है । यानी आज की इस चर्चा में हम चौंकाने वाले उन आलेखों की बात करेंगे जिन्हें पढ़ने के बाद आप यह कहने को विवश हो जायेंगे कि क्या सचमुच ऐसा ही है ? आईये उत्सुकता बढ़ाने वाले आलेख...

भोपाल गैस त्रासदी

...तो अब मुंह खोलेंगे अर्जुन सिंह विजय कुमार झा न्यूज़ एडिटर, भास्कर डॉट कॉम भोपाल गैस त्रासदी के पीडि़तों के पक्ष में हर ओर से उठ रही आवाज के मद्देनजर अब प्रधानमंत्री को भी बोलना पड़ा है । उन्‍होंने मंत्रियों के समूह से दस दिन में रिपोर्ट देने के लिए कहा है। वह इस रिपोर्ट को जल्‍द ही कैबिनेट में भी विचार के लिए रखे जाने की बात कह रहे हैं। मंत्रियों के समूह को यह पता भी लगाना है कि भोपाल गैस कांड का मुख्‍य अभियुक्‍त वारेन एंडरसन कैसे देश से भागने में कामयाब रहा। इसका जवाब अर्जुन सिंह को पता है। पर वह कह रहे हैं कि सही समय पर मुंह खोलेंगे। तो क्‍या दस दिन में वह समय आने वाला है? या अर्जुन के मुंह खोले बिना मंत्रियों का समूह 'सच' सामने लाने वाला है। भोपाल गैस कांड का मुद्दा फिलहाल अदालती फैसला आने के बाद गरम हुआ है। हर ओर से दो बातों के विरोध में ही सुर उठ रहे हैं। एक तो, हजारों मौतों के जिम्‍मेदार लोगों को महज दो साल की सजा और उसमें भी तुरंत जमानत मिल जाने के विरोध में है। और, दूसरा यह कि मुख्‍य अभियुक्‍त वारेन एंडरसन को कांड के तुरंत बाद सरकार ने भगा दिया और फिर उसे भारत न...

लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009, भाग-6

आईये शुरुआत करते हैं व्यंग्य से , क्योंकि व्यंग्य ही वह माध्यम है जिससे सामने वाला आहत नहीं होता और कहने वाला अपना काम कर जाता है । ऐसा ही एक ब्लॉग पोस्ट है जिसपर सबसे पहले मेरी नज़र जाकर ठहरती है .... १५ अप्रैल को सुदर्शन पर प्रकाशित इस ब्लॉग पोस्ट का शीर्षक है - आम चुनाव का पितृपक्ष ......व्यंग्यकार का कहना है कि -" साधो , इस साल दो पितृ पक्ष पड़ रहे हैं । दूसरा पितृ पक्ष पण्डितों के पत्रा में नहीं है लेकिन वह चुनाव आयोग के कलेण्डर में दर्ज है । इस आम चुनाव में तुम्हारे स्वर्गवासी माता पिता धरती पर आयेंगे , वे मतदान केन्द्रों पर अपना वोट देंग और स्वर्ग लौट जायेंगे । " इस व्यंग्य में नरेश मिश्र ने चुटकी लेते हुए कहा है कि -" अब मृत कलेक्ट्रेट कर्मी श्रीमती किशोरी त्रिपाठी को अगर मतदाता पहचान पत्र हासिल हो जाता है और उसमें महिला की जगह पुरूष की फोटो चस्पा है तो इस पर भी आला हाकिमों और चुनाव आयोग को अचरज नहीं होना चा...

लो क सं घ र्ष !: हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009, भाग-5

आईये आज की चर्चा की शुरुआत करते हैं सामाजिक , सांस्कृतिक और एतिहासिक महत्व से संवंधित विविध विषयों पर केंद्रित कुछ महत्वपूर्ण पोस्ट से । " ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति का माध्यम है। पर सार्वजनिक रूप से अपने को अभिव्यक्त करना आप पर जिम्मेदारी भी डालता है। लिहाजा, अगर आप वह लिखते हैं जो अप्रिय हो, तो धीरे धीरे अपने पाठक खो बैठते हैं।" यह कहना है श्री ज्ञान दत्त पांडे जी का मानसिक हलचल के २६ जनवरी के पोस्ट अपनी तीव्र भावनायें कैसे व्यक्त करें? पर व्यक्त की गई टिपण्णी में । वहीं उड़न तश्तरी .... के १३ फरवरी (प्रेम दिवस ) के पोस्ट मस्त रहें सब मस्ती में... में श्री समीर भाई ने बहुत ही मार्मिक बोध कथा का जिक्र किया है कि" एक साधु गंगा स्नान को गया तो उसने देखा कि एक बिच्छू जल में बहा जा रहा है। साधु ने उसे बचाना चाहा। साधु उसे पानी से निकालता तो बिच्छू उसे डंक मार देता और छूटकर पानी में गिर जाता। साधु ने कई बार प्रयास किया मगर बिच्छू बार-बार डंक मार कर छूटता जाता था। साधु ने सोचा कि जब यह बिच्छू अपने तारणहार के प्रति भी अपनी डंक मारने की पाशविक प्रवृत्ति को नही...